इस प्रकार श्रीहरि और हिरण्याक्ष एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रुद्ध होकर आपसमें अपनी भारी गदाओंसे प्रहार करने लगे॥ १८॥✎ 279
एवं गदाभ्यां गुर्वीभ्यां हर्यक्षो हरिरेव च।
जिगीषया सुसंरब्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः॥ १८
इस प्रकार श्रीहरि और हिरण्याक्ष एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रुद्ध होकर आपसमें अपनी भारी गदाओंसे प्रहार करने लगे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 323) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/18/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)