श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

ततः सपत्नं मुखतश्‍चरन्तमकुतोभयम्।

जघानोत्पत्य गदया हनावसुरमक्षजः॥ २

tataḥ sapatnaṃ mukhataścarantamakutobhayam|

jaghānotpatya gadayā hanāvasuramakṣajaḥ|| 2

अर्थ

फिर उन्होंने झपटकर अपने सामने निर्भय विचरते हुए शत्रुकी ठुड्डीपर गदा मारी। किन्तु हिरण्याक्षकी गदासे टकराकर वह गदा भगवान्‌के हाथसे छूट गयी और चक्कर काटती हुई जमीनपर गिरकर सुशोभित हुई। किंतु यह बड़ी अद्भुत-सी घटना हुई॥ २-३॥✎ 281

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #281 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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