श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

बहुभिर्यक्षरक्षोभिः पत्त्यश्‍वरथकुञ्जरैः।

आततायिभिरुत्सृष्टा हिंस्रा वाचोऽतिवैशसाः॥ २१

bahubhiryakṣarakṣobhiḥ pattyaśvarathakuñjaraiḥ|

ātatāyibhirutsṛṣṭā hiṃsrā vāco'tivaiśasāḥ|| 21

अर्थ

बहुत-से पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियोंपर चढ़े सैनिकोंके साथ आततायी यक्ष-राक्षसोंका ‘मारो-मारो, काटो-काटो’ ऐसा अत्यन्त क्रूर और हिंसामय कोलाहल सुनायी देने लगा॥ २१॥✎ 286 287

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #286 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #287 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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