श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

स तदा लब्धतीर्थोऽपि न बबाधे निरायुधम्।

मानयन् स मृधे धर्मं विष्वक्सेनं प्रकोपयन्॥ ४

sa tadā labdhatīrtho'pi na babādhe nirāyudham|

mānayan sa mṛdhe dharmaṃ viṣvaksenaṃ prakopayan|| 4

अर्थ

उस समय शत्रुपर वार करनेका अच्छा अवसर पाकर भी हिरण्याक्षने उन्हें निरस्त्र देखकर युद्धधर्मका पालन करते हुए उनपर आक्रमण नहीं किया। उसने भगवान्‌का क्रोध बढ़ानेके लिये ही ऐसा किया था॥ ४॥✎ 281

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #281 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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