श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

स तं निशाम्यात्तरथाङ्गमग्रतो

व्यवस्थितं पद्मपलाशलोचनम्।

विलोक्य चामर्षपरिप्लुतेन्द्रियो

रुषा स्वदन्तच्छदमादशच्छ्वसन्॥ ७

sa taṃ niśāmyāttarathāṅgamagrato

vyavasthitaṃ padmapalāśalocanam|

vilokya cāmarṣapariplutendriyo

ruṣā svadantacchadamādaśacchvasan|| 7

अर्थ

जब हिरण्याक्षने देखा कि कमल-दल-लोचन श्रीहरि उसके सामने चक्र लिये खड़े हैं, तब उसकी सारी इन्द्रियाँ क्रोधसे तिलमिला उठीं और वह लम्बी साँसें लेता हुआ अपने दाँतोंसे होठ चबाने लगा॥ ७॥✎ 282 283 284

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #282 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,
  • #283 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् ने → श्रीवराहभगवान्‌ने
  • #284 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें