श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे

संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।

ये संयुगेऽचक्षत तार्क्ष्यपुत्र-

मंसे सुनाभायुधमापतन्तम्॥ २४

manye'surān bhāgavatāṃstryadhīśe

saṃrambhamārgābhiniviṣṭacittān |

ye saṃyuge'cakṣata tārkṣyaputra-

maṃse sunābhāyudhamāpatantam|| 24

अर्थ

मैं असुरोंको भी भगवान्‌का भक्त समझता हूँ; क्योंकि वैरभावजनित क्रोधके कारण उनका चित्त सदा श्रीकृष्णमें लगा रहता था और उन्हें रणभूमिमें सुदर्शनचक्रधारी भगवान्‌को कंधेपर चढ़ाकर झपटते हुए गरुड़जीके दर्शन हुआ करते थे॥ २४॥✎ 196

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #196 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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