श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

ततो नन्दव्रजमितः पित्रा कंसाद्विबिभ्यता।

एकादश समास्तत्र गूढार्चिः सबलोऽवसत्॥ २६

tato nandavrajamitaḥ pitrā kaṃsādvibibhyatā|

ekādaśa samāstatra gūḍhārciḥ sabalo'vasat|| 26

अर्थ

उस समय कंसके डरसे पिता वसुदेवजीने उन्हें नन्दबाबाके व्रजमें पहुँचा दिया था। वहाँ वे बलरामजीके साथ ग्यारह वर्षतक इस प्रकार छिपकर रहे कि उनका प्रभाव व्रजके बाहर किसीपर प्रकट नहीं हुआ॥ २६॥✎ 197 198 199

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #197 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #198 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #199 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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