श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

कौमारीं दर्शयंश्चेष्टां प्रेक्षणीयां व्रजौकसाम्।

रुदन्‍निव हसन्मुग्धबालसिंहावलोकनः॥ २८

kaumārīṃ darśayaṃśceṣṭāṃ prekṣaṇīyāṃ vrajaukasām|

rudanniva hasanmugdhabālasiṃhāvalokanaḥ|| 28

अर्थ

वे व्रजवासियोंकी दृष्टि आकृष्ट करनेके लिये अनेकों बाल-लीला उन्हें दिखाते थे। कभी रोने-से लगते, कभी हँसते और कभी सिंहशावकके समान मुग्ध दृष्टिसे देखते॥ २८॥✎ 197 198 199

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #197 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #198 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #199 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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