श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

उद्धव उवाच

कृष्णद्युमणिनिम्लोचे गीर्णेष्वजगरेण ह।

किं नु नः कुशलं ब्रूयां गतश्रीषु गृहेष्वहम्॥ ७

kṛṣṇadyumaṇinimloce gīrṇeṣvajagareṇa ha|

kiṃ nu naḥ kuśalaṃ brūyāṃ gataśrīṣu gṛheṣvaham|| 7

अर्थ

उद्धवजी बोले—विदुरजी! श्रीकृष्णरूप सूर्यके छिप जानेसे हमारे घरोंको कालरूप अजगरने खा डाला है, वे श्रीहीन हो गये हैं; अब मैं उनकी क्या कुशल सुनाऊँ॥ ७॥✎ 191 192

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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