श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

ससर्जच्छाययाविद्यां पंचपर्वाणमग्रतः।

तामिस्रमन्धतामिस्रं तमो मोहो महातमः॥ १८

sasarjacchāyayāvidyāṃ paṃcaparvāṇamagrataḥ|

tāmisramandhatāmisraṃ tamo moho mahātamaḥ|| 18

अर्थ

सबसे पहले उन्होंने अपनी छायासे तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह—यों पाँच प्रकारकी अविद्या उत्पन्‍न की॥ १८॥ ब्रह्माजीको अपना वह तमोमय शरीर अच्छा नहीं लगा, अतः उन्होंने उसे त्याग दिया। तब जिससे भूख-प्यासकी उत्पत्ति होती है—ऐसे रात्रिरूप उस शरीरको उसीसे उत्पन्‍न हुए यक्ष और राक्षसोंने ग्रहण कर लिया॥ १९॥ उस समय भूख-प्याससे अभिभूत होकर वे ब्रह्माजीको खानेको दौड़ पड़े और कहने लगे—‘इसे खा जाओ, इसकी रक्षा मत करो’ क्योंकि वे भूख-प्याससे व्याकुल हो रहे थे॥ २०॥ ब्रह्माजीने घबराकर उनसे कहा—‘अरे यक्ष-राक्षसो! तुम मेरी सन्तान हो; इसलिये मुझे भक्षण मत करो, मेरी रक्षा करो!’ (उनमेंसे जिन्होंने कहा ‘खा जाओ’, वे यक्ष हुए और जिन्होंने कहा ‘रक्षा मत करो’, वे राक्षस कहलाये)॥ २१॥

यह व्याख्या श्लोक 3.20.18 से 3.20.21 तककी एक साथ है।

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