अपनी तिरोधानशक्तिसे ब्रह्माजीने सिद्ध और विद्याधरोंकी सृष्टि की और उन्हें अपना वह अन्तर्धान नामक अद्भुत शरीर दिया॥ ४४॥ एक बार ब्रह्माजीने अपना प्रतिबिम्ब देखा। तब अपनेको बहुत सुन्दर मानकर उस प्रतिबिम्बसे किन्नर और किम्पुरुष उत्पन्न किये॥ ४५॥ उन्होंने ब्रह्माजीके त्याग देनेपर उनका वह प्रतिबिम्ब-शरीर ग्रहण किया। इसीलिये ये सब उषःकालमें अपनी पत्नियोंके साथ मिलकर ब्रह्माजीके गुण-कर्मादिका गान किया करते हैं॥ ४६॥
यह व्याख्या श्लोक 3.20.44 से 3.20.46 तककी एक साथ है।
सिद्धान् विद्याधरांश्चैव तिरोधानेन सोऽसृजत्।
तेभ्योऽददात्तमात्मानमन्तर्धानाख्यमद्भुतम्॥ ४४
अपनी तिरोधानशक्तिसे ब्रह्माजीने सिद्ध और विद्याधरोंकी सृष्टि की और उन्हें अपना वह अन्तर्धान नामक अद्भुत शरीर दिया॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 333) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/44/