॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.20.47
देहेन वै भोगवता शयानो बहुचिन्तया।
सर्गेऽनुपचिते क्रोधादुत्ससर्ज ह तद्वपुः॥ ४७
dehena vai bhogavatā śayāno bahucintayā|
sarge'nupacite krodhādutsasarja ha tadvapuḥ|| 47
अर्थ
एक बार ब्रह्माजी सृष्टिकी वृद्धि न होनेके कारण बहुत चिन्तित होकर हाथ-पैर आदि अवयवोंको फैलाकर लेट गये और फिर क्रोधवश उस भोगमय शरीरको त्याग दिया॥ ४७॥ उससे जो बाल झड़कर गिरे, वे अहि हुए तथा उसके हाथ-पैर सिकोड़कर चलनेसे क्रूरस्वभाव सर्प और नाग हुए, जिनका शरीर फणरूपसे कंधेके पास बहुत फैला होता है॥ ४८॥