श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तयोः संवदतोः सूत प्रवृत्ता ह्यमलाः कथाः।

आपो गांगा इवाघघ्नीर्हरेः पादाम्बुजाश्रयाः॥ ५

tayoḥ saṃvadatoḥ sūta pravṛttā hyamalāḥ kathāḥ|

āpo gāṃgā ivāghaghnīrhareḥ pādāmbujāśrayāḥ|| 5

अर्थ

सूतजी! उन दोनोंमें वार्तालाप होनेपर श्रीहरिके चरणोंसे सम्बन्ध रखनेवाली बड़ी पवित्र कथाएँ हुई होंगी, जो उन्हीं चरणोंसे निकले हुए गंगाजलके समान सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली होंगी॥ ५॥✎ 291

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #291 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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