श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तथा स चाहं परिवोढुकामः

समानशीलां गृहमेधधेनुम्।

उपेयिवान्मूलमशेषमूलं

दुराशयः कामदुघाङ्‌घ्रिपस्य॥ १५

tathā sa cāhaṃ parivoḍhukāmaḥ

samānaśīlāṃ gṛhamedhadhenum|

upeyivānmūlamaśeṣamūlaṃ

durāśayaḥ kāmadughāṅghripasya|| 15

अर्थ

प्रभो! आप कल्पवृक्ष हैं। आपके चरण समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं। मेरा हृदय काम-कलुषित है। मैं भी अपने अनुरूप स्वभाव-वाली और गृहस्थधर्मके पालनमें सहायक शीलवती कन्यासे विवाह करनेके लिये आपके चरणकमलोंकी शरणमें आया हूँ॥ १५॥

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