प्रजापते! मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती; फिर जिनका चित्त निरन्तर एकान्तरूपसे मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम-जैसे महात्माओंके द्वारा की हुई उपासनाका तो और भी अधिक फल होता है॥ २४॥✎ 300
न वै जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम्।
भवद्विधेष्वतितरां मयि संगृभितात्मनाम्॥ २४
प्रजापते! मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती; फिर जिनका चित्त निरन्तर एकान्तरूपसे मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम-जैसे महात्माओंके द्वारा की हुई उपासनाका तो और भी अधिक फल होता है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.21.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 337) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/21/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#300 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने