श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

न वै जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम्।

भवद्विधेष्वतितरां मयि संगृभितात्मनाम्॥ २४

na vai jātu mṛṣaiva syātprajādhyakṣa madarhaṇam|

bhavadvidheṣvatitarāṃ mayi saṃgṛbhitātmanām|| 24

अर्थ

प्रजापते! मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती; फिर जिनका चित्त निरन्तर एकान्तरूपसे मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम-जैसे महात्माओंके द्वारा की हुई उपासनाका तो और भी अधिक फल होता है॥ २४॥✎ 300

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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