॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.21.41
मत्तद्विजगणैर्घुष्टं मत्तभ्रमरविभ्रमम्।
मत्तबर्हिनटाटोपमाह्वयन्मत्तकोकिलम् ॥ ४१
mattadvijagaṇairghuṣṭaṃ mattabhramaravibhramam|
mattabarhinaṭāṭopamāhvayanmattakokilam || 41
अर्थ
वहाँ झुंड-के-झुंड मतवाले पक्षी चहक रहे थे, मतवाले भौंरे मँडरा रहे थे, उन्मत्त मयूर अपने पिच्छ फैला-फैलाकर नटकी भाँति नृत्य कर रहे थे और मतवाले कोकिल कुहू-कुहू करके मानो एक-दूसरेको बुला रहे थे॥ ४१॥