श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अथोटजमुपायातं नृदेवं प्रणतं पुरः।

सपर्यया पर्यगृह्णात्प्रतिनन्द्यानुरूपया॥ ४८

athoṭajamupāyātaṃ nṛdevaṃ praṇataṃ puraḥ|

saparyayā paryagṛhṇātpratinandyānurūpayā|| 48

अर्थ

महाराज स्वायम्भुव मनुको अपनी कुटीमें आकर प्रणाम करते देख उन्होंने उन्हें आशीर्वादसे प्रसन्‍न किया और यथोचित आतिथ्यकी रीतिसे उनका स्वागत-सत्कार किया॥ ४८॥

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