श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.52

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

न यदा रथमास्थाय जैत्रं मणिगणार्पितम्।

विस्फूर्जच्चण्डकोदण्डो रथेन त्रासयन्‍नघान्॥ ५२

na yadā rathamāsthāya jaitraṃ maṇigaṇārpitam|

visphūrjaccaṇḍakodaṇḍo rathena trāsayannaghān|| 52

अर्थ

आप मणियोंसे जड़े हुए जयदायक रथपर सवार हो अपने प्रचण्ड धनुषकी टंकार करते हुए उस रथकी घरघराहटसे ही पापियोंको भयभीत कर देते हैं और अपनी सेनाके चरणोंसे रौंदे हुए भूमण्डलको कँपाते अपनी उस विशाल सेनाको साथ लेकर पृथ्वीपर सूर्यके समान विचरते हैं। यदि आप ऐसा न करें तो चोर-डाकू भगवान्‌की बनायी हुई वर्णाश्रमधर्मकी मर्यादाको तत्काल नष्ट कर दें तथा विषयलोलुप निरंकुश मानवोंद्वारा सर्वत्र अधर्म फैल जाय। यदि आप संसारकी ओरसे निश्चिन्त हो जायँ तो यह लोक दुराचारियोंके पंजेमें पड़कर नष्ट हो जाय॥ ५२-५५॥✎ 303

यह अर्थ श्लोक 52–55 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #303 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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