॥ श्रीहरिः ॥
निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम्।
यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम्॥ ३४
niṣṇātaṃ yogamāyāsu muniṃ svāyambhuvaṃ manum|
yadā bhraṃśayituṃ bhogā na śekurbhagavatparam|| 34
अर्थ
वे इच्छानुसार भोगोंका निर्माण करनेमें कुशल थे; किन्तु मननशील और भगवत्परायण होनेके कारण भोग उन्हें किंचित् भी विचलित नहीं कर पाते थे॥ ३४॥
निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम्।
यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम्॥ ३४
वे इच्छानुसार भोगोंका निर्माण करनेमें कुशल थे; किन्तु मननशील और भगवत्परायण होनेके कारण भोग उन्हें किंचित् भी विचलित नहीं कर पाते थे॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 344) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/34/