श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तत्रेतिकृत्यमुपशिक्ष यथोपदेशं

येनैष मे कर्शितोऽतिरिरंसयाऽऽत्मा।

सिद्ध्येत ते कृतमनोभवधर्षिताया

दीनस्तदीश भवनं सदृशं विचक्ष्व॥ ११

tatretikṛtyamupaśikṣa yathopadeśaṃ

yenaiṣa me karśito'tiriraṃsayā''tmā|

siddhyeta te kṛtamanobhavadharṣitāyā

dīnastadīśa bhavanaṃ sadṛśaṃ vicakṣva|| 11

अर्थ

हम दोनोंके समागमके लिये शास्त्रके अनुसार जो कर्तव्य हो, उसका आप उपदेश दीजिये और उबटन, गन्ध, भोजन आदि उपयोगी सामग्रियाँ भी जुटा दीजिये, जिससे मिलनकी इच्छासे अत्यन्त दीन, दुर्बल हुआ मेरा यह शरीर आपके अंग-संगके योग्य हो जाय; क्योंकि आपकी ही बढ़ायी हुई कामवेदनासे मैं पीडित हो रही हूँ। स्वामिन्! इस कार्यके लिये एक उपयुक्त भवन तैयार हो जाय, इसका भी विचार कीजिये॥ ११॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें