जहाँ-तहाँ दीवारोंमें की हुई शिल्परचनासे उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसमें पन्नेका फर्श था और बैठनेके लिये मूँगेकी वेदियाँ बनायी गयी थीं॥ १७॥
तत्र तत्र विनिक्षिप्तनानाशिल्पोपशोभितम्।
महामरकतस्थल्या जुष्टं विद्रुमवेदिभिः॥ १७
जहाँ-तहाँ दीवारोंमें की हुई शिल्परचनासे उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसमें पन्नेका फर्श था और बैठनेके लिये मूँगेकी वेदियाँ बनायी गयी थीं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 347) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/17/