फिर उन्होंने अपनेको नौ रूपोंमें विभक्त कर रतिसुखके लिये अत्यन्त उत्सुक मनुकुमारी देवहूतिको आनन्दित करते हुए उसके साथ बहुत वर्षोंतक विहार किया, किन्तु उनका इतना लम्बा समय एक मुहूर्तके समान बीत गया॥ ४४॥
विभज्य नवधाऽऽत्मानं मानवीं सुरतोत्सुकाम्।
रामां निरमयन् रेमे वर्षपूगान्मुहूर्तवत्॥ ४४
फिर उन्होंने अपनेको नौ रूपोंमें विभक्त कर रतिसुखके लिये अत्यन्त उत्सुक मनुकुमारी देवहूतिको आनन्दित करते हुए उसके साथ बहुत वर्षोंतक विहार किया, किन्तु उनका इतना लम्बा समय एक मुहूर्तके समान बीत गया॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 350) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/44/