श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

बहुजन्मविपक्वेन सम्यग्योगसमाधिना।

द्रष्टुं यतन्ते यतयः शून्यागारेषु यत्पदम्॥ २८

bahujanmavipakvena samyagyogasamādhinā|

draṣṭuṃ yatante yatayaḥ śūnyāgāreṣu yatpadam|| 28

अर्थ

किन्तु जिनके स्वरूपको योगिजन अनेकों जन्मोंके साधनसे सिद्ध हुई सुदृढ़ समाधिके द्वारा एकान्तमें देखनेका प्रयत्न करते हैं, अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाले वे ही श्रीहरि हम विषयलोलुपोंके द्वारा होनेवाली अपनी अवज्ञाका कुछ भी विचार न कर आज हमारे घर अवतीर्ण हुए हैं॥ २८-२९॥

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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