॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.24.32
त्वां सूरिभिस्तत्त्वबुभुत्सयाद्धा
सदाभिवादार्हणपादपीठम् ।
ऐश्वर्यवैराग्ययशोऽवबोध-
वीर्यश्रिया पूर्त्तमहं प्रपद्ये॥ ३२
tvāṃ sūribhistattvabubhutsayāddhā
sadābhivādārhaṇapādapīṭham |
aiśvaryavairāgyayaśo'vabodha-
vīryaśriyā pūrttamahaṃ prapadye|| 32
अर्थ
आपका पाद-पीठ तत्त्वज्ञानकी इच्छासे विद्वानोंद्वारा सर्वदा वन्दनीय है तथा आप ऐश्वर्य, वैराग्य, यश, ज्ञान, वीर्य और श्री—इन छहों ऐश्वर्योंसे पूर्ण हैं। मैं आपकी शरणमें हूँ ॥ ३२॥