देव! इन देह-गेह आदिमें जो मैं-मेरेपनका दुराग्रह होता है, वह भी आपका ही कराया हुआ है; अतः अब आप मेरे इस महामोहको दूर कीजिये॥ १०॥
अथ मे देव सम्मोहमपाक्रष्टुं त्वमर्हसि।
योऽवग्रहोऽहंममेतीत्येतस्मिन् योजितस्त्वया॥ १०
देव! इन देह-गेह आदिमें जो मैं-मेरेपनका दुराग्रह होता है, वह भी आपका ही कराया हुआ है; अतः अब आप मेरे इस महामोहको दूर कीजिये॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 357) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/25/10/