॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.25.12
मैत्रेय उवाच
इति स्वमातुर्निरवद्यमीप्सितं
निशम्य पुंसामपवर्गवर्धनम्।
धियाभिनन्द्यात्मवतां सतां गति-
र्बभाष ईषत्स्मितशोभिताननः॥ १२
iti svamāturniravadyamīpsitaṃ
niśamya puṃsāmapavargavardhanam|
dhiyābhinandyātmavatāṃ satāṃ gati-
rbabhāṣa īṣatsmitaśobhitānanaḥ|| 12
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार माता देवहूतिने अपनी जो अभिलाषा प्रकट की, वह परम पवित्र और लोगोंका मोक्षमार्गमें अनुराग उत्पन्न करनेवाली थी, उसे सुनकर आत्मज्ञ सत्पुरुषोंकी गति श्रीकपिलजी उसकी मन-ही-मन प्रशंसा करने लगे और फिर मृदु मुसकानसे सुशोभित मुखारविन्दसे इस प्रकार कहने लगे॥ १२॥