श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

इति स्वमातुर्निरवद्यमीप्सितं

निशम्य पुंसामपवर्गवर्धनम्।

धियाभिनन्द्यात्मवतां सतां गति-

र्बभाष ईषत्स्मितशोभिताननः॥ १२

iti svamāturniravadyamīpsitaṃ

niśamya puṃsāmapavargavardhanam|

dhiyābhinandyātmavatāṃ satāṃ gati-

rbabhāṣa īṣatsmitaśobhitānanaḥ|| 12

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार माता देवहूतिने अपनी जो अभिलाषा प्रकट की, वह परम पवित्र और लोगोंका मोक्षमार्गमें अनुराग उत्पन्‍न करनेवाली थी, उसे सुनकर आत्मज्ञ सत्पुरुषोंकी गति श्रीकपिलजी उसकी मन-ही-मन प्रशंसा करने लगे और फिर मृदु मुसकानसे सुशोभित मुखारविन्दसे इस प्रकार कहने लगे॥ १२॥

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