इस प्रकार प्रकृतिके गुणोंसे उत्पन्न हुए शब्दादि विषयोंका त्याग करनेसे, वैराग्ययुक्त ज्ञानसे, योगसे और मेरे प्रति की हुई सुदृढ़ भक्तिसे मनुष्य मुझ अपने अन्तरात्माको इस देहमें ही प्राप्त कर लेता है॥ २७॥
असेवयायं प्रकृतेर्गुणानां
ज्ञानेन वैराग्यविजृम्भितेन।
योगेनमय्यर्पितया च भक्त्या
मां प्रत्यगात्मानमिहावरुन्धे॥ २७
इस प्रकार प्रकृतिके गुणोंसे उत्पन्न हुए शब्दादि विषयोंका त्याग करनेसे, वैराग्ययुक्त ज्ञानसे, योगसे और मेरे प्रति की हुई सुदृढ़ भक्तिसे मनुष्य मुझ अपने अन्तरात्माको इस देहमें ही प्राप्त कर लेता है॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.25.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 359) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/25/27/