॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.25.40
विसृज्य सर्वानन्यांश्च मामेवं विश्वतोमुखम्।
भजन्त्यनन्यया भक्त्या तान्मृत्योरतिपारये१॥ ४०
visṛjya sarvānanyāṃśca māmevaṃ viśvatomukham|
bhajantyananyayā bhaktyā tānmṛtyoratipāraye|| 40
अर्थ
माताजी! जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकोंमें साथ जानेवाले वासनामय लिंगदेहको तथा शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले जो धन, पशु एवं गृह आदि पदार्थ हैं, उन सबको और अन्यान्य संग्रहोंको भी छोड़कर अनन्य भक्तिसे सब प्रकार मेरा ही भजन करते हैं—उन्हें मैं मृत्युरूप संसारसागरसे पार कर देता हूँ॥ ३९-४०॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—रभिपारये।