श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

पितरि प्रस्थितेऽरण्यं मातुः प्रियचिकीर्षया।

तस्मिन् बिन्दुसरेऽवात्सीद्भगवान् कपिलः किल॥ ५

pitari prasthite'raṇyaṃ mātuḥ priyacikīrṣayā|

tasmin bindusare'vātsīdbhagavān kapilaḥ kila|| 5

अर्थ

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! पिताके वनमें चले जानेपर भगवान् कपिलजी माताका प्रिय करनेकी इच्छासे उस बिन्दुसर तीर्थमें रहने लगे॥ ५॥

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