श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

देवहूतिरुवाच

निर्विण्णा नितरां भूमन्‍नसदिन्द्रियतर्षणात्।

येन सम्भाव्यमानेन प्रपन्‍नान्धं तमः प्रभो॥ ७

nirviṇṇā nitarāṃ bhūmannasadindriyatarṣaṇāt|

yena sambhāvyamānena prapannāndhaṃ tamaḥ prabho|| 7

अर्थ

देवहूति बोली—भूमन्! प्रभो! इन दुष्ट इन्द्रियोंकी विषय-लालसासे मैं बहुत ऊब गयी हूँ और इनकी इच्छा पूरी करते रहनेसे ही घोर अज्ञानान्धकारमें पड़ी हुई हूँ॥ ७॥

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