आत्मदर्शनरूप ज्ञान ही पुरुषके मोक्षका कारण है और वही उसकी अहंकाररूप हृदयग्रन्थिका छेदन करनेवाला है, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। उस ज्ञानका मैं तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ॥ २॥✎ 317
ज्ञानं निःश्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम्।
यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम्॥ २
आत्मदर्शनरूप ज्ञान ही पुरुषके मोक्षका कारण है और वही उसकी अहंकाररूप हृदयग्रन्थिका छेदन करनेवाला है, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। उस ज्ञानका मैं तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 362) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने