श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

सहस्रशिरसं साक्षाद्यमनन्तं प्रचक्षते।

सङ्कर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम्॥ २५

sahasraśirasaṃ sākṣādyamanantaṃ pracakṣate|

saṅkarṣaṇākhyaṃ puruṣaṃ bhūtendriyamanomayam|| 25

अर्थ

इस भूत, इन्द्रिय और मनरूप अहंकारको ही पण्डितजन साक्षात् ‘संकर्षण’ नामक सहस्र सिरवाले अनन्तदेव कहते हैं॥ २५॥✎ 319 320

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #319 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #320 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें