यह मनस्तत्त्व ही इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ‘अनिरुद्ध’ के नामसे प्रसिद्ध है। योगिजन शरत्कालीन नीलकमलके समान श्याम वर्णवाले इन अनिरुद्धजीकी शनैः-शनैः मनको वशीभूत करके आराधना करते हैं॥ २८॥✎ 319320
यद्विदुर्ह्यनिरुद्धाख्यं हृषीकाणामधीश्वरम्।
शारदेन्दीवरश्यामं संराध्यं योगिभिः शनैः॥ २८
यह मनस्तत्त्व ही इन्द्रियोंके अधिष्ठाता ‘अनिरुद्ध’ के नामसे प्रसिद्ध है। योगिजन शरत्कालीन नीलकमलके समान श्याम वर्णवाले इन अनिरुद्धजीकी शनैः-शनैः मनको वशीभूत करके आराधना करते हैं॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 364) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)