श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

संशयोऽथ विपर्यासो निश्‍चयः स्मृतिरेव च।

स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक्१॥ ३०

saṃśayo'tha viparyāso niścayaḥ smṛtireva ca|

svāpa ityucyate buddherlakṣaṇaṃ vṛttitaḥ pṛthak|| 30

अर्थ

वृत्तियोंके भेदसे संशय, विपर्यय (विपरीत ज्ञान), निश्‍चय, स्मृति और निद्रा भी बुद्धिके ही लक्षण हैं। यह बुद्धितत्त्व ही ‘प्रद्युम्न’ है॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—क्‍वचित्।

    (मुद्रित पृष्ठ 365)

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