॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.43
क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्यायनोन्दनम्।
तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः॥ ४३
kledanaṃ piṇḍanaṃ tṛptiḥ prāṇanāpyāyanondanam|
tāpāpanodo bhūyastvamambhaso vṛttayastvimāḥ|| 43
अर्थ
गीला करना, मिट्टी आदिको पिण्डाकार बना देना, तृप्त करना, जीवित रखना, प्यास बुझाना, पदार्थोंको मृदु कर देना, तापकी निवृत्ति करना और कूपादिमेंसे निकाल लिये जानेपर भी वहाँ बार-बार पुनः प्रकट हो जाना—ये जलकी वृत्तियाँ हैं॥ ४३॥