श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.49

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

परस्य दृश्यते धर्मो ह्यपरस्मिन् समन्वयात्।

अतो विशेषो भावानां भूमावेवोपलक्ष्यते१॥ ४९

parasya dṛśyate dharmo hyaparasmin samanvayāt|

ato viśeṣo bhāvānāṃ bhūmāvevopalakṣyate|| 49

अर्थ

वायु आदि कार्य-तत्त्वोंमें आकाशादि कारण-तत्त्वोंके रहनेसे उनके गुण भी अनुगत देखे जाते हैं; इसलिये समस्त महाभूतोंके गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध केवल पृथ्वीमें ही पाये जाते हैं॥ ४९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—लभ्यते।

    (मुद्रित पृष्ठ 367)

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