श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.58

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट्।

पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः॥ ५८

hastau ca nirabhidyetāṃ balaṃ tābhyāṃ tataḥ svarāṭ|

pādau ca nirabhidyetāṃ gatistābhyāṃ tato hariḥ|| 58

अर्थ

तदनन्तर हाथ प्रकट हुए, उनसे बल और बलके बाद हस्तेन्द्रियका अभिमानी इन्द्र उत्पन्‍न हुआ। फिर चरण प्रकट हुए, उनसे गति (गमनकी क्रिया) और फिर पादेन्द्रियका अभिमानी विष्णुदेवता उत्पन्‍न हुआ॥ ५८॥

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