॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.8
कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः।
भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम्॥ ८
kāryakāraṇakartṛtve kāraṇaṃ prakṛtiṃ viduḥ|
bhoktṛtve sukhaduḥkhānāṃ puruṣaṃ prakṛteḥ param|| 8
अर्थ
कार्यरूप शरीर, कारणरूप इन्द्रिय तथा कर्तारूप इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवताओंमें पुरुष जो अपनेपनका आरोप कर लेता है, उसमें पण्डितजन प्रकृतिको ही कारण मानते हैं तथा वास्तवमें प्रकृतिसे परे होकर भी जो प्रकृतिस्थ हो रहा है, उस पुरुषको सुख-दुःखोंके भोगनेमें कारण मानते हैं॥ ८॥✎ 317