श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

मन्यमानस्तदाऽऽत्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा।

नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः॥ १५

manyamānastadā''tmānamanaṣṭo naṣṭavanmṛṣā|

naṣṭe'haṅkaraṇe draṣṭā naṣṭavitta ivāturaḥ|| 15

अर्थ

(जाग्रत्-अवस्थामें यह आत्मा भूत-सूक्ष्मादि दृश्यवर्गके द्रष्टारूपमें स्पष्टतया अनुभवमें आता है; किन्तु) सुषुप्तिके समय अपने उपाधिभूत अहंकारका नाश होनेसे वह भ्रमवश अपनेको ही नष्ट हुआ मान लेता है और जिस प्रकार धनका नाश हो जानेपर मनुष्य अपनेको भी नष्ट हुआ मानकर अत्यन्त व्याकुल हो जाता है, उसी प्रकार वह भी अत्यन्त विवश होकर नष्टवत् हो जाता है॥ १५॥

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