श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

अकर्तुः कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रयः।

गुणेषु सत्सु प्रकृतेः कैवल्यं तेष्वतः कथम्॥ १९

akartuḥ karmabandho'yaṃ puruṣasya yadāśrayaḥ|

guṇeṣu satsu prakṛteḥ kaivalyaṃ teṣvataḥ katham|| 19

अर्थ

अतः जिनके आश्रयसे अकर्ता पुरुषको यह कर्मबन्धन प्राप्त हुआ है, उन प्रकृतिके गुणोंके रहते हुए उसे कैवल्यपद कैसे प्राप्त होगा?॥ १९॥

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