श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

स एष यर्हि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते।

अहंक्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते॥ २

sa eṣa yarhi prakṛterguṇeṣvabhiviṣajjate|

ahaṃkriyāvimūḍhātmā kartāsmītyabhimanyate|| 2

अर्थ

किन्तु जब वही प्राकृत गुणोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, तब अहंकारसे मोहित होकर ‘मैं कर्ता हूँ’—ऐसा मानने लगता है॥ २॥

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