॥ श्रीहरिः ॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषान्।
प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ११
prāṇāyāmairdaheddoṣāndhāraṇābhiśca kilbiṣān|
pratyāhāreṇa saṃsargāndhyānenānīśvarān guṇān|| 11
अर्थ
अतः योगीको उचित है कि प्राणायामसे वात-पित्तादिजनित दोषोंको, धारणासे पापोंको, प्रत्याहारसे विषयोंके सम्बन्धको और ध्यानसे भगवद्विमुख करनेवाले राग-द्वेषादि दुर्गुणोंको दूर करे॥ ११॥✎ 326
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषान्।
प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥ ११
अतः योगीको उचित है कि प्राणायामसे वात-पित्तादिजनित दोषोंको, धारणासे पापोंको, प्रत्याहारसे विषयोंके सम्बन्धको और ध्यानसे भगवद्विमुख करनेवाले राग-द्वेषादि दुर्गुणोंको दूर करे॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 374) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/28/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #326 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की