श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कांचीगुणोल्लसच्छ्रोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम्।

दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम्॥ १६

kāṃcīguṇollasacchroṇiṃ hṛdayāmbhojaviṣṭaram|

darśanīyatamaṃ śāntaṃ manonayanavardhanam|| 16

अर्थ

कमरमें करधनीकी लड़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही हैं; भक्तोंके हृदयकमल ही उनके आसन हैं, उनका दर्शनीय श्यामसुन्दर स्वरूप अत्यन्त शान्त एवं मन और नयनोंको आनन्दित करनेवाला है॥ १६॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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