श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

ध्यानायनं प्रहसितं बहुलाधरोष्ठ-

भासारुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति।

ध्यायेत्स्वदेहकुहरेऽवसितस्य विष्णो-

र्भक्‍त्याऽऽर्द्रयार्पितमना न पृथग्दिदृक्षेत्॥ ३३

dhyānāyanaṃ prahasitaṃ bahulādharoṣṭha-

bhāsāruṇāyitatanudvijakundapaṅkti|

dhyāyetsvadehakuhare'vasitasya viṣṇo-

rbhaktyā''rdrayārpitamanā na pṛthagdidṛkṣet|| 33

अर्थ

अत्यन्त प्रेमार्द्रभावसे अपने हृदयमें विराजमान श्रीहरिके खिलखिलाकर हँसनेका ध्यान करे, जो वस्तुतः ध्यानके ही योग्य है तथा जिसमें ऊपर और नीचेके दोनों होठोंकी अत्यधिक अरुण कान्तिके कारण उनके कुन्दकलीके समान शुभ्र छोटे-छोटे दाँतोंपर लालिमा-सी प्रतीत होने लगी है। इस प्रकार ध्यानमें तन्मय होकर उनके सिवा किसी अन्य पदार्थको देखनेकी इच्छा न करे॥ ३३॥

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