॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.28.35
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तं
निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः।
आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेक-
मन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः॥ ३५
muktāśrayaṃ yarhi nirviṣayaṃ viraktaṃ
nirvāṇamṛcchati manaḥ sahasā yathārciḥ|
ātmānamatra puruṣo'vyavadhānameka-
manvīkṣate pratinivṛttaguṇapravāhaḥ|| 35
अर्थ
जैसे तेल आदिके चुक जानेपर दीपशिखा अपने कारणरूप तेजस्-तत्त्वमें लीन हो जाती है, वैसे ही आश्रय, विषय और रागसे रहित होकर मन शान्त—ब्रह्माकार हो जाता है। इस अवस्थाके प्राप्त होनेपर जीव गुणप्रवाहरूप देहादि उपाधिके निवृत्त हो जानेके कारण ध्याता, ध्येय आदि विभागसे रहित एक अखण्ड परमात्माको ही सर्वत्र अनुगत देखता है॥ ३५॥✎ 330 331