श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः।

प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरमचंचलम्॥ ९

prāṇasya śodhayenmārgaṃ pūrakumbhakarecakaiḥ|

pratikūlena vā cittaṃ yathā sthiramacaṃcalam|| 9

अर्थ

आरम्भमें बायें नासिकासे पूरक, कुम्भक और रेचक करे, फिर इसके विपरीत दाहिनी नासिकासे प्राणायाम करके प्राणके मार्गका शोधन करे—जिससे चित्त स्थिर और निश्‍चल हो जाय॥ ९॥

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