श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा।

तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम्॥ २१

ahaṃ sarveṣu bhūteṣu bhūtātmāvasthitaḥ sadā|

tamavajñāya māṃ martyaḥ kurute'rcāviḍambanam|| 21

अर्थ

मैं आत्मारूपसे सदा सभी जीवोंमें स्थित हूँ; इसलिये जो लोग मुझ सर्वभूतस्थित परमात्माका अनादर करके केवल प्रतिमामें ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वाँगमात्र है॥ २१॥

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