श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्‍नदर्शिनः।

भूतेषु बद्धवैरस्य न मनः शान्तिमृच्छति॥ २३

dviṣataḥ parakāye māṃ mānino bhinnadarśinaḥ|

bhūteṣu baddhavairasya na manaḥ śāntimṛcchati|| 23

अर्थ

जो भेददर्शी और अभिमानी पुरुष दूसरे जीवोंके साथ वैर बाँधता है और इस प्रकार उनके शरीरोंमें विद्यमान मुझ आत्मासे ही द्वेष करता है, उसके मनको कभी शान्ति नहीं मिल सकती॥ २३॥

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