श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.29.39

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः।

आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत्॥ ३९

na cāsya kaściddayito na dveṣyo na ca bāndhavaḥ|

āviśatyapramatto'sau pramattaṃ janamantakṛt|| 39

अर्थ

इसका न तो कोई मित्र है न कोई शत्रु और न तो कोई सगा-सम्बन्धी ही है। यह सर्वदा सजग रहता है और अपने स्वरूपभूत श्रीभगवान्‌को भूलकर भोगरूप प्रमादमें पड़े हुए प्राणियोंपर आक्रमण करके उनका संहार करता है॥ ३९॥✎ 336

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #336 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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