इसका न तो कोई मित्र है न कोई शत्रु और न तो कोई सगा-सम्बन्धी ही है। यह सर्वदा सजग रहता है और अपने स्वरूपभूत श्रीभगवान्को भूलकर भोगरूप प्रमादमें पड़े हुए प्राणियोंपर आक्रमण करके उनका संहार करता है॥ ३९॥✎ 336
न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः।
आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत्॥ ३९
इसका न तो कोई मित्र है न कोई शत्रु और न तो कोई सगा-सम्बन्धी ही है। यह सर्वदा सजग रहता है और अपने स्वरूपभूत श्रीभगवान्को भूलकर भोगरूप प्रमादमें पड़े हुए प्राणियोंपर आक्रमण करके उनका संहार करता है॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.29.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 384) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/29/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#336 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को