श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुकः।

याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमसः पदम्॥ ३३

kevalena hyadharmeṇa kuṭumbabharaṇotsukaḥ|

yāti jīvo'ndhatāmisraṃ caramaṃ tamasaḥ padam|| 33

अर्थ

जो पुरुष निरी पापकी कमाईसे ही अपने परिवारका पालन करनेमें व्यस्त रहता है, वह अन्धतामिस्र नरकमें जाता है—जो नरकोंमें चरम सीमाका कष्टप्रद स्थान है॥ ३३॥

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